Saturday, April 4, 2015

चल रास्ते बदल लें Raste

        दो शब्दों में मिटा दिया सब
       हमतो तुम्हे खुदा से भी उपर
       समझ बैठे थे
          तुम खुदा न सही
       इंसान तो बन सकते थे
         हम कंकरों में हीरे तलाशते रहे
         तुम किरचें बन कब घाव दे गए
          कुछ भी नहीं सोचा
        खनाक से सब तबाह कर दिया
         पल भर सोचा तो होता
         कुछ और भी टूटा है
        विशवास तो बना रहने देते
        कहाँ भूल भुल्लैया में उलझ बैठे
         फ़रिश्ते कहां से समझ बैठे
           इंसानों  का जहाँ अकाल पड़ा है
        तुम भी औरों  जैसे ही निकले
       अंदर तक तोड़ दिया तुमने
       इतने उपर बिठा दिया है तुम्हें
        कि अब गिरा भी नहीं सकते
        अच्छा है रस्ते बदल लें

         वरना राह में जब भी मिले

        तो   किरचें  लहू लुहान कर देंगी
        


         

       

16 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (25.04.2014) को "चल रास्ते बदल लें " (चर्चा अंक-1593)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. बहुत ही सुंदर एवं भावपूर्ण रचना ! शुभकामनायें !

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  3. bahut -bahut sundar .....parkhiye mat kisi ko ...

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  4. बहुत सुंदर......

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    1. धन्यवाद आशीष भाई जी

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    1. शुक्रिया राजीव कुमार झा जी

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  7. आज तो इंसान ढूंढें नहीं मिलते ... आवरण के पीछे शैतान मिलते हैं ...
    भावपूर्ण रचना ..

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    1. सही कहा आपने Digamber जी

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